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सोमवार, 25 जनवरी 2010

नीतीश जी के "सुशासन" के दावो पर खरे नहीं उतर रहे उनके ही घर-जिले के नौकरशाह!

समूचे देश मे "सुशासन कुमार " के नाम से चर्चित हो रहे बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के सुशासन का बेडागर्क उनके ही घरजिले के शीर्ष अधिकारी करने पर तुले है! शासन के हर स्तर पर खुद मुख्यमंत्री जितने सजग और गंभीर नजर आते है,उनके मातहत नौकरशाह / अफसरशाह कही अधिक अगंभीर और लापरवाह.संलगन खबर को ध्यान से पढिये.सारी तस्वीर समझ मे आने लगेगी. चूकि मामले की शिकायत सीधे मुख्यमंत्री से भी की गयी है,इसलिये यहाँ यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि वाकई सुशासन के नारे व ईरादे के बल बिहार की छवि बदलने के बाद कुशासन पर उनका नज़रिया कितना तीखी है.बहरहाल फैक्स व ई-मेल द्वारा सीधी सूचना देने के बावजूद भी उनके या उनके सचिवालय ने अब तक इस ओर कोई सुध न ली है

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

झारखंड मे संभावित टकराव की जवाबदेही कौन लेगा?शिबू सरकार या सुप्रीम कोर्ट?

जहाँ एक ओर झारखंड मे पदासीन शिबू सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार पेसा कानून के तहत पंचायत चुनाव कराने को कटिबद्ध दिख रही है वही, मात्र 27 %आदिवासी समुदाय की तुलना मे 73% सदानो यानि गैरआदिवासी की आबादी के प्रायः कद्दावर नेताओ ने किसी भी हालत मे पेसा कानून मे आवश्यक संशोधन किये वगैर पंचायत चुनाव नही होने देने की कडी चेतावनी दी है और निर्णायक आन्दोलन करने की दिशा मे गोलबन्द हो चले है.वेशक उग्रवाद का पर्याय बने झारखंड मे आदिवासी और गैरआदिवासी के बीच पेसा चुनाव के तहत पंचायत चुनाव एक ऐसी आपसी टकराव को जन्म देगी,जिसे पाटना आने वाले दिनों मे बहुत मुश्किल होगी.मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ग्रामीण परिवेश की आदिवासी राजनीति तो करते है,लेकिन उनका जनाधार गैरआदिवासी समुदाय खासकर महतो जाति मे कही अधिक झलकती है.

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

मुंबई मे हिन्दी भाषियो के ख़िलाफ अब कांग्रेसी मुहिम: बाल-राज ठाकरे के वाद सोनिया मैडम के युवराज राहुल?

पहले बाल ठाकरे,फिर उसका भतीजा राज ठाकरे और अब कांग्रेस के मुखियाईन सोनिया मैडम की महाराष्ट्र सरकार.कभी क्षेत्रीय तो कभी भाषाई भावनाएँ भडका कर वोट की राजनीति करने मे माहिर कांग्रेस और उसकी ऐसी सरकारे अखिर देशवासियो के सामने भारत की कैसी तस्वीर प्रस्तुत करना चाहती है!एक तरफ कांगेस सोनिया पुत्र को पार्टी का युवराज घोषित कर राष्ट्रीय राजनीति करने तथा खोई पहचान वापस पाने की एडी-चोटी एक कर रही है वही दुसरी तरफ अपनी ही नेत्रीत्व वाली राज्य सरकर को इस तरह की घिनौनी राजनीति कर रही है कि उसके पूर्वज भी शर्मा जाये.जबकि सच्चाई तो यह है मुंबई न तो बाल-राज ठाकरे की बाप की जागीर है और न ही कांग्रेस या अन्य किसी भी राजनीतिक दल की एकमात्र सूबा.इस तरह के लोग,दल या सरकार कल ये न कहना शुरू कर दे कि मुंबई मे वही लोग रह सकते है जिन्हे मराठी भाषा लिखने-पढने-बोलने आता हो.अब समय आ गया है सोनिया की कांग्रेस देश के सामने यह स्पष्ट करे कि वे स्व.नेहरू के फूट डालो राज करो की राजनीति करते रहेगी या कभी सरदार बल्लभभाई पटेल की अखंड राष्ट्र के मूल्यो को बनाये रखेगी?

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

भारतीय कानून के आदेश से: ये झारखंड के प्रधान है! और पुनः प्रधान बनेगे!!

जी हाँ ये भारतीय क़ानून है। इसे किसने लिखा ? बाबा आंबेडकर साहेब ने / गांघी जी ने /नेहरू जी ने या फ़िर हमारे राजेन्द्र बाबू ने.जिसके तहत झारखण्ड में ये नजारादिख रहा है।
केन्द्र सरकार ने ग्रामीण पंचायती राज्य व्यवस्था के तहत विकास कार्यों के मजबूती के लिए सारे अधिकार ग्राम प्रधानों को सौंप दी है । समूचे प्रांत में प्रधान के सारे पद अनुसूचित जाति जन जाति के लिए आरक्षित कर दी है।एक सर्वेक्षण के अनुसार करीव 35% प्रधान असिक्षित है । ७८ % से अधिक ग्राम प्रधान हरिया-दारू-गांजा-भांग जैसे दिमागी संतुलन ख़राब करने वाली नशा करते है। करीव ९२% ग्राम प्रधानो को विकास योजनाओं की सही जानकारी नहीं है । वामुश्किल एक-दो % से इतर लूट-खसोंट में संलिप्त हैं। आधे से अधिक प्रधान ग्रामीणों की की बैठक सुचारू ढंग से नही करते और सरकारी अधिकारियों से कभी कभार ही बातचीत कर पाते हैं।उक्त सर्वेक्षण में इस तरह के कई संवेदनशील तथ्य उभरकर सामने आई है।उल्लेखनीय तत्थ है कि झारखण्ड प्रांत
में करीव 27% आबादी अनुसूचित जाति जन जाति की है, वही 73% आबादी उन लोगों की है जिसे शाशन प्रसाशन मूलवासी मानता है. एक बार फिर ये सुप्रीम कोर्ट के चपेट मे आ गये है और समुचे झारखण्ड मे इनका गुस्सा उबाल पर है.

आजसू के सुदेश महतो मे जनहित के बजाय स्वार्थ भरी राजनीति की झलक

लग झारखंड प्रांत गठन के बाद से यदि यहाँ की राजनीति की गहन अध्ययन की जाये तो एक बात साफ जाहिर होता है कि बिहार मे लालूजी के लूट आतंक राज्य के विरूद्ध जहाँ नीतीश कुमार ने नया संगठन खडा कर विकास और भाईचारे का नारा देकर आज की तारीख मे सब कुछ बदल दिया,वही झारखंड मे पुराने नेता अपने पुराने तेवरमे ही रहे और नये नेताओ का हुजुम मधु कोडा सरीखे निकले. कांग्रेस, भाजपा, झामुमो, राजद के नेताओ को पुराना मान छोड दे तो बन्धु तिर्की,एनोसएक्का,हरिनारयण राय,कमलेश सिन्ह,भानु प्रताप शाही सरीखे नेता राज्य की जनता के पिछे कम और काला धन इकठ्ठा करने के पिछे कही अधिक भागे.शयद इन्हे विश्वास है कि वह नेता उतना ही बडा होता है,जितना अधिक उसके पास धन होता है,चहे वह काला धन ही क्यो हो! यहाँ यह उल्लेख करना जरूरी हो जाता है कि जिस तरह से झारखंड के छोटे-छोटे संगठनो के नेताओ (निरदलीय विधायको) को सत्ता मे अहम भागीदारी मिली.यदि ये चाहते तो नई मिशाल कायम कर जनप्रिय बन सकते थे.लेकिन इनलोगो ने मिशाले तो कायम की है मगर यहाँ की 3 करोड दीन-हीन जनता को शर्मसार करने वाली.अब हम बात करते है आजसू के मुखिया सुदेश महतो की.मेरी समझ मे ये युवातुर्क पिछले एक दशक से सता की प्रमुख धुरी बन बैठा है.अर्जून मुंडा,मधु कोडा की सरकार तो इनके गुलाम बन गये थे.इस बार की शिबू सरकार की लट्टू भी इन्ही की कील पर है.इन्हे इनके सहयोगी विधायको को कई महत्वपूर्ण विभाग मिलते रहे है और इस बार भी मिले है.श्री मह्तो खुद कई महत्वपूर्ण विभाग के साथ होम मिनिस्टर तक बने है.लेकिन प्रांत मे उनका एक ऐसी भी उपलब्धि नही रही है,जिसपर आम जनता का विश्वास बढ सके.पहले एक,फिर दो और अब दो से पाँच सीट लाना.यह उनकी राज्यस्तरीय लोकप्रियता नही बल्कि सीमित लक्षित क्षेत्रो पर विशेष ध्यान देना है.इनकी मांसिकता से लगता है कि आगे भी वे इसी प्रयास मे जुटे रहेगे.सुदेश महतो को भ्रम है कि नेता का कद उसके उल्लेखणीय कार्यो से नही अपितु मंत्रिमंडल के बडे पद से बढता है.इन्हे कम से कम बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से यह सीख लेनी चाहिये कि पद कोई भी हो,जनपरक कार्यो से लोकप्रियता हासिल की जा सकता है. बहरहाल,झारखंड मे जरूरत है एक ऐसी सरकार की जो अपना कार्यकाल पूरा करे और आमजन की कसौटी पर खरा उतर उतरे.यदि झामुमो के शिबू सोरेन को भाजपा और आजसू ने प्रदेश का मुखिया चुना है तो उन्हें राज्य हित मे कार्य करने की पूरी छूट मिलनी चाहिये. उन्हें ब्लैकमेल करने की कोशिश का अर्थ हैसमुचे झारखंड को ब्लैकमेल करना.जो किसी के भी हित मे नही है.